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Centre for the Study of Social Exclusion and Inclusive Policy

भेदभाव और बहिष्कार के अध्ययन के लिए केंद्र भेद भाव और बहिष्कार की बनावट और परक्रिया के अध्ययन के लिए सामाजिक विज्ञान के स्कूल, जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी में एक अनोखा सस्थानिक जगह है। सामाजिक बहिष्कार एक बहुआयामी प्रक्रिया है जो व्यक्ति और संघ को सामाजिक सम्बंदों और संस्था से अलग करता है और अर्थव्यवस्था,समाज और राजनीतिक जीव के विभिन्न तथ्यों में हिस्सा लेना असंभव बनाती है। इस केंद्र का मुख्य ध्यान भेदभाव और बहिष्कार की विभिन्न वर्तमान और भविष्य जगहों पर अन्य खोज करना है जो सामाजिक ग्रुप जैसे दलित, कबिले और धार्मिक अल्पसंख्यक को बुरी तरह प्रभावित करते हैं।

मूल और विकास

२००२ में, प्रो प्रभात पटनैक, बाद में डीन ,सामाजिक विज्ञान के स्कूल को भेदभाव और बहिष्कार के बारे में अध्ययन प्रोग्राम के बारे में विचार आया और प्रोफेसर रोमिला थापर(चेयर) और प्रोफेसर एस.के.थोरात, टी.के ऊमेन, घनश्याम शाह, अभिजित सेन और जोया हसन (कोन्वेनोर )को जाति,कबीले और धर्म के आधार पर भेदभाव और बहिष्कार पर केन्द्रित होने के साथ प्रोग्राम के बारे में बताने को कहा।इसे पूर्ण रूप से पहचाना गया कि मुख्य स्थान जहाँ बहिष्कार का अध्ययन और अतिक्रमन किया जा सकता है वह यूनिवर्सिटी है जो इस मुद्दे पर अन्य खोज कर सकती है और करती है क्यूंकि इसके सैद्धांतिक और नीति प्रभाव हैं।इसके अतिरिक्त केंद्र तुलनात्मक और बहु-आन्तरिक अनुशासन ढांचे जो शिक्षा और खोज प्रोग्राम जो भेदभाव और बहिष्कार का अध्ययन करते हैं को एक साथ लाने में सक्षम है , जो विभिन्न बनावटी रूट्स और विभिन्न प्रकार और विभिन्न सामाजिक और आर्थिक घेरे में अभिव्यक्ति प्रदान करता है। भारतीय समाज में भेदभाव और बहिष्कार के संशोधन और दस्तावेजों में भेदभाव और बहिष्कार के अध्ययन के लिए प्रोग्राम (पीएसडीई) २०१५ में स्थापित किया गया।पीएसडीई को भेदभाव और बहिष्कार के अध्ययन के केंद्र के लिए अप्रैल २०१२ में अधिसूचित किया गया था। पिछले कुछ सालों से, सी एस डीई (पीएसडीई) ने सामाजिक बहिष्कार और समावेशी योजना(सीएसएसईआईपी) के अध्ययन के लिए केंद्र स्थापित करने के लिए युजीसी की योजना का फायदा उठा कर अपने संस्थानिक मूल और संसाधन को बड़ा लिया है।

 

निम्नलिखित सीएसडीई के मानद निदेशक हैं:

प्रोफेसर जोया हसन, राजनीतिक अध्ययन के लिए केंद्र(२००५-०६); प्रोफेसर पी.एम. कुलकर्णी, क्षेत्रीय विकास के अध्ययन के लिए केंद्र(२००६-०८);प्रोफेसर प्रलय कानूनगो,राजनीतिक अध्ययन के लिए केंद्र(२००८-१०);प्रोफेसर गीता बी.नम्बिस्सन,जाकिर हुसैन,शैक्षिक अध्ययन के लिए केंद्र(२०१०-१२);प्रोफेसर विधु वर्मा, राजनीतिक अध्ययन के लिए केंद्र(२०१२-१३); प्रोफेसर सुरिंदर सिंह जोधका, सामाजिक प्रणाली के अध्ययन के लिए केंद्र(२०१३-१४) ।

उद्देश्य

• जाति, जनजाति और धर्म के आधार पर भेदभाव और अपवर्जन को अवधारण करना

• भारतीय समाज में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यकों के भेदभाव और बहिष्करण पर ध्यान देने वाले अकादमिक कार्यक्रमों की पेशकश करने के लिए।

•सरकारी एजेंसियों द्वारा उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक डेटा का विस्तृत और महत्वपूर्ण विश्लेषण करने और नीतियों और कार्यक्रमों का अध्ययन के समावेश के लिए संलग्न करें।

• इन समूहों के सदस्यों के बहिष्कार की प्रक्रिया ,भेदभाव और परिस्थितियों के अनुभवों और परिणामों पर दस्तावेज,संगठित और सूचनाएं और तथ्य उत्पन्न करने के लिए।

• अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों और गैर सरकारी संगठनों के साथ समुदाय के आउटरीच और नेटवर्किंग के लिए।
• सेमिनार, व्याख्यान और कार्यशालाओं को व्यवस्थित करने के लिए।

जोर क्षेत्रों

यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि भेदभाव सार्वजनिक संस्थाओं, कानूनी व्यवस्था, विश्वविद्यालय और स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ सामाजिक संस्थानों जैसे घरों में भी होता है। इन कारणों के लिए किए गए शोध का जोर इस बात पर है कि कैसे भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार व्यक्तियों और हाशिए सामाजिक समूहों को ऊर्जा केंद्रों के बाहर बनाए रखता है। विशेष रूप से, केंद्र की अनुसंधान रूचि, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यकों के अध्ययन पर है, अंतर को ध्यान में रखते हुए जैसे कि वर्ग, लिंग, क्षेत्र और अन्य क्षेत्रों में।